विश्व वरिष्ठ नागरिक दिवस

पुरखों की धरोहर

झुकी हुई वो कमर नहीं, इतिहास की कहानी है,
सफ़ेद बालों में छुपी, जीवन की रवानी है।

हर लकीर चेहरे की, अनुभव का खजाना है,
उनके बिना तो जीवन, अधूरा सा फ़साना है।

चलते रहे जो उम्र भर, न थके, न कभी रुके,
हमारे आज की नींव में, उनके पाँव धँसे चुके।

संघर्षों की छांव में, जो मुस्काए हर घड़ी हैं,
उन बुजुर्गों को सलाम भविष्य की तस्वीर गढ़ी है!

आज भी हैं वो साये जैसे, ठंडी छाँव वाले,
संस्कारों की मिसाल, प्रेम से जीने वाले।

हर दुआ में है असर, हर बात में गहराई,
उनके अनुभव से ही, हर पीढ़ी ने राह पाई।

चरण पखारें उनके, उन्हें नमन करें सच्चे दिल से,
थाम लें उनका हाथ, चलें फिर उनके साथ मिल के।

सम्मान दें, अपनाएं उन्हें, न हो कोई दूरी,
बोझ ना समझें जीवन में पुरखों की धरोहर जरूरी।

विरेन्द्र जैन “माहिर”
नागपुर महाराष्ट्र