अंतर्राष्ट्रीय वृद्ध जन दिवस

कुछ रिश्तों का कोई नाम नहीं होता, पर वो हर नाम से बड़े होते हैं।”-

मेरा बचपन बाकी बच्चों जैसा नहीं था। जहाँ बच्चे अपने माता-पिता की उंगली पकड़कर चलना सीखते हैं, वहीं मेरा पूरा बचपन मेरी नानी के घर की चौखट और नाना-नानी के साये में बीता। मेरे माता-पिता शहर  में रहते थे। कहने को तो सब थे, पर पास में सिर्फ मेरे बूढ़े नाना-नानी थे। उन्होंने मुझे माँ की ममता भी दी, पिता का साया भी और भाई-बहन का दुलार भी।

पर एक सच यह भी था कि वह दौर बहुत मुश्किलों भरा था। आज के बच्चों की तरह हमारे पास हर ज़िद्द पूरी करने की सहूलियत नहीं थी। कई बार छोटी-छोटी चीज़ों के लिए तरसना पड़ता था, पर आज पीछे मुड़कर देखती हूँ तो समझ आता है कि उन अभावों ने मुझे ‘सब्र’ और ‘चीज़ों की कद्र करना’ सिखाया। हमारे बड़े-बुजुर्ग अनजाने में ही हमें जिंदगी के सबसे बड़े पाठ पढ़ा जाते हैं।

मेरे जीवन की सबसे बड़ी सीख मुझे मेरे बचपन के एक बहुत ही दर्दनाक वाकये से मिली। मैं उस समय स्कूल में थी। स्कूल में ‘पैरेंट्स-टीचर मीटिंग’ (PTM) थी। क्लास के सभी बच्चों के मम्मी-पापा आए हुए थे। मेरे नाना-नानी बहुत बुजुर्ग थे, शरीर से कमज़ोर होने के कारण वे स्कूल आने की स्थिति में नहीं थे।

जब मेरी बारी आई, तो टीचर ने सख्त लहजे में पूछा, “तुम अपने पैरेंट्स को लेकर क्यों नहीं आईं? अब तुम्हें फाइन (जुर्माना) भरना होगा।” मैंने बहुत मासूमियत से सहमते हुए कहा, “मैम, मेरे मम्मी-पापा यहाँ नहीं रहते, वो देहरादून में हैं। मैं अपने नाना-नानी के साथ रहती हूँ और वो बहुत बुजुर्ग हैं, इसलिए आ नहीं पाए।”

मेरी इस बात पर, मदद या सहानुभूति जताने के बजाय, उस शिक्षिका ने भरी क्लास में मेरा मज़ाक उड़ाया। उन्होंने कुछ ऐसी बातें कहीं जो एक बच्चे के कोमल मन को छलनी करने के लिए काफी थीं। बाकी बच्चे हंस रहे थे, और मेरी आँखों से आंसू बह रहे थे।

मैं उस दिन रोती हुई घर पहुँची। खुद को कमरे में बंद करके मैं बहुत रोई। मन में यह टीस थी कि मेरे मम्मी-पापा मेरे साथ क्यों नहीं हैं? जब मेरी नानी ने मुझे इस हाल में देखा, तो उन्होंने मुझे अपने सीने से लगा लिया। मेरे आंसू पोंछते हुए उन्होंने जो कहा, वह आज भी मेरे कानों में गूंजता है।

नानी ने कहा था: “रो मत मेरी बच्ची। क्या मैंने तुझे माँ और बाप दोनों का प्यार नहीं दिया? ये दुनिया है, बोलने वाले तो बहुत कुछ कह जाते हैं। लेकिन जिंदगी में एक चीज़ हमेशा याद रखना— हमेशा अपने दिल की करना। दुनिया में सबकी सुनना, जो भी कोई कह रहा है उसे सुनो, किसी को निराश मत करो, लेकिन करना वही जो तुम्हारे दिल को सही लगे। जब तुम्हें लगे कि यह रास्ता सही है, तो बिना डरे उस पर कदम बढ़ा देना।”

नानी के उन झुर्रियों वाले हाथों के स्पर्श और उस एक सीख ने मेरे भीतर के सारे रोने को एक हिम्मत में बदल दिया। आज जब मैं पीछे मुड़कर देखती हूँ, तो समझती हूँ कि उस दिन अगर टीचर ने मेरा मज़ाक न उड़ाया होता, तो शायद मुझे नानी की वह अनमोल सीख कभी न मिलती।

बुजुर्गों की बातें सिर्फ सलाह नहीं होतीं, वो उनकी

 पूरी जिंदगी का निचोड़ होती हैं। आज मैं जो कुछ भी हूँ, अपने पैरों पर खड़ी हूँ और सही-गलत का फैसला ले पाती हूँ, वह सब मेरी नानी की उसी एक सीख की बदौलत है। अंतर्राष्ट्रीय वृद्धजन दिवस पर, मैं अपनी नानी और नाना के चरणों में शीश झुकाती हूँ, जिन्होंने अपनी ढलती उम्र में मेरे भविष्य को संवारा

प्रियंका कैंतुरा