खामोशी की ज़ुबान
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खामोशी की ज़ुबान उन आवाज़ों का संकलन है, जो अक्सर कहे बिना रह जाती हैं। यह पुस्तक मौन, पीड़ा, प्रेम, प्रतीक्षा, टूटन, उम्मीद और आत्मसंघर्ष के उन भावों को शब्द देती है, जिन्हें समाज, परिस्थितियाँ या डर बोलने नहीं देते।
इस संकलन में विविध पृष्ठभूमियों से आए रचनाकारों की कविताएँ और गद्य रचनाएँ शामिल हैं—जहाँ हर रचना एक आईना है, और हर पाठक उसमें स्वयं को देख सकता है। यह किताब शोर के विरुद्ध खड़ी एक संवेदनशील दस्तावेज़ है, जो बताती है कि खामोशी सिर्फ़ चुप्पी नहीं होती—वह भी अपनी एक ज़ुबान रखती है।
खामोशी की ज़ुबान उन पाठकों के लिए है, जो महसूस करते हैं गहराई से, सोचते हैं मौन में, और शब्दों में खुद को तलाशते हैं।
Description
खामोशी की ज़ुबान उन आवाज़ों का संकलन है, जो अक्सर कहे बिना रह जाती हैं। यह पुस्तक मौन, पीड़ा, प्रेम, प्रतीक्षा, टूटन, उम्मीद और आत्मसंघर्ष के उन भावों को शब्द देती है, जिन्हें समाज, परिस्थितियाँ या डर बोलने नहीं देते।
इस संकलन में विविध पृष्ठभूमियों से आए रचनाकारों की कविताएँ और गद्य रचनाएँ शामिल हैं—जहाँ हर रचना एक आईना है, और हर पाठक उसमें स्वयं को देख सकता है। यह किताब शोर के विरुद्ध खड़ी एक संवेदनशील दस्तावेज़ है, जो बताती है कि खामोशी सिर्फ़ चुप्पी नहीं होती—वह भी अपनी एक ज़ुबान रखती है।
खामोशी की ज़ुबान उन पाठकों के लिए है, जो महसूस करते हैं गहराई से, सोचते हैं मौन में, और शब्दों में खुद को तलाशते हैं।






